.

संविधान एवं महापरिनिर्वाण दिवस समारोह

आज डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमाओं के अनावरण और उनके प्रतिष्ठानों के निर्माण कार्य में कूदने की होड़ मची हुई है। कल तक जो लोग उनके आंदोलन के कट्टर दुश्मन थे, वे आज उनकी विरासत को हड़पने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। आज अंबेडकरी आंदोलन के महत्व को उनके विरोधी भी समझ गए हैं। उन्हें  ऐसा  भय  है  कि  निम्न  जातियों  के लोगों पर उनकी पकड़ कमजोर होती जा रही है। इसी लिए अंबेडकर के सहारे अपनी छवि को बहुजन हितैषी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। डा.अम्बेडकर मात्र शिक्षाविद या दार्शनिक नहीं थे, उन्होंने जो भी अध्ययन किया उसका मात्र प्रचार ही नहीं किया बल्कि उसे अपने जीवन में उतारकर अभ्यास में लाने का भी प्रयत्न किया। उन्होंने अपने लोगों के सम्मान, जीवनस्तर की उन्नति और अवसर की समानता के लिए कड़ी मेहनत की और तदनुसार अपने साथी नागरिकों को भी आश्वस्त किया।

1891 में जन्मे डॉ. अंबेडकर की छुआछूत के विरुद्ध कार्यवाही 1917 में और राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1926 में बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य के रूप में हुई। 1927 तक, अम्बेडकर ने अस्पृश्यता के खिलाफ सक्रिय आंदोलन शुरू करने का फैसला किया था। 25 दिसंबर 1927 को, उन्होंने मनुस्मृति की प्रतियां जलाने के लिए हजारों लोगों का नेतृत्व किया और 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस के रूप में मनाया।

डॉ. अम्बेडकर ने महसूस किया कि उस समय कम्युनिस्ट नेता केवल मजदूरों के अधिकारों के लिए काम कर रहे थे लेकिन दलित श्रमिकों के मानवाधिकारों के लिए नहीं। अंबेडकर ने जाति पर काम करते हुए इस विचार को स्पष्ट किया कि जाति केवल 'श्रम का विभाजन' नहीं है, बल्कि श्रेणीबद्ध असमानता पर आधारित 'मजदूरों का विभाजन' है। उन्होंने स्पष्ट रूप से श्रम आंदोलन और अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन के महत्व और अंतर-संबंध को समझा। इसलिए, 1936 में डा. अम्बेडकर ने "स्वतंत्र लेबर पार्टी" की स्थापना की, जिसके बैनर पर 1937 में बॉम्बे केंद्रीय विधान सभा के लिए चुनाव लड़ा और 14 सीटें हासिल कीं। डॉ. अंबेडकर 1937 से 1942 तक विधायक के रूप में बॉम्बे विधानसभा के लिए चुने गए थे।

उन्हें 7 जुलाई, 1942 को वायसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य के रूप में शपथ दिलाई गई और वे 1946 तक इसी पद पर कार्यरत रहे। उस स्थिति में उन्होंने भारत के मजदूर वर्ग के लिए बहुत योगदान दिया। उल्लेखनीय योगदानों में से एक यह है कि 27 नवंबर, 1942 को नई दिल्ली में भारतीय श्रम सम्मेलन के 7वें सत्र के दौरान, उनके प्रयासों के माध्यम से कारखाने के काम के घंटे भारत में 14 से कम करके 8 घंटे किए गए थे।

डॉ. अम्बेडकर को इस बात में कोई संदेह नहीं था कि जीवन यापन की उचित परिस्थितियों और पारिश्रिमिक के बिना डिप्रैस्ड क्लॉस का आंदोलन सफल नहीं हो सकता। 1946 के बाद उनका सामाजिक-राजनीतिक कार्य पूरी तरह से संविधान के निर्माण के आसपास केंद्रित हो गया, जो अंततः उनके सपनों को साकार कर सका। संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 में निहित मौलिक अधिकारों और अनुच्छेद 39, 41, 42 और 43 में वर्णित नीति निर्देशक सिद्धांतों का परिशीलन दर्शाता है कि श्रमिकों की समस्याओं को डा. अम्बेडकर ने कितना महत्व दिया। मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद  23 में प्रावधान है कि किसी भी श्रमिक को बलपूर्वक या जबरदस्ती काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। परंतु नवीनतम उपलब्ध ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स के अनुसार भारत में आज आधुनिक दासता में रहने वाले लोगों की संख्या लगभग 80 लाख है। मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 24 में बाल श्रम पर प्रतिबंध होने के बावजूद भारत में आज लगभग 280 लाख कामकाजी बच्चे हैं। न्यूनतम वेतन के कानूनों के बावजूद आज भारत में 45 फीसदी से अधिक श्रमिक न्यूनतम मजदूरी से कम पर काम कर रहे हैं।

उपरोक्त आंकड़े आज के भारत की असली तस्वीर पेश करते हैं। देश के मजदूरों की वास्तविक स्थिति को लेकर उनका दुश्मन चौकन्ना है। इस पर पर्दा डालने के लिए मजदूरों का विरोधी वर्ग डॉ आंबेडकर की विरासत को हथियाने की कोशिश कर रहा है। वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? निश्चित रूप से वे भारत में एक और अम्बेडकर देखना नहीं चाहते हैं जो वास्तविक कारणों को आगे ले जाने और निवारण करने में सक्षम हो।

उनके आध्यात्मिक या धार्मिक पहलू पर विश्लेषण करें तो उनका यह पक्ष भी इसी निष्कर्ष की ओर इशारा करता है। डॉ.  अंबेडकर ने 1936 में अपनी किताब "जाति के विनाश" में उन धार्मिक धारणाओं खासतौर से वर्णव्यवस्था जिन पर जाति व्यवस्था आधारित है को नष्ट करने का आह्वान किया। यह मानते हुए कि पुरोहित ही वह दुर्देव (evilgenius) जिसने समस्त अंधविश्वासों को जन्म दिया, डॉ. बी आर अंबेडकर अपनी पुस्तक "बुद्ध और उनका धम्म" में स्वीकार किया है कि मस्तिष्क ही समस्त विचारों केन्द्र है। उन्होंने यह भी माना है कि मतिष्क ही समस्त अच्छाइयों और बुराईयों का स्रोत/ उद्गम है जो हमारे अंदर ज्वार भाटा पैदा करता है इस लिए उन्होंने कहा है कि मन की सफाई धर्म का सार है।

विभिन्न धर्मों का आजीवन अध्ययन करने के बाद डॉ.  आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एकमात्र धर्म जो वैज्ञानिक और तर्कसंगत है, वह बौद्ध धर्म है, जिसका पालन हर व्यक्ति कर सकता है क्योंकि यह ज्ञान को पूर्णता (प्रज्ञा) तक ले जाता है। बोधिसत्व का किसी धर्म विशेष पर नहीं रुकता बल्कि वह समस्त धर्मों की आवश्यक मौलिक  प्रकृति पर विचार करता है और दूसरों को भी ऐसा ही प्रेरित करने के लिए विचार करता है।

आध्यात्मिक मोर्चे पर भारत में आज जो कुछ भी हो रहा है, उसके बारे में आपको ज्यादा सोचने की जरुरत नहीं है सिवाय इसके कि जिन पुरोहितों को डॉ. अम्बेडकर ने दुर्देव (evilgenius) कहा था आज वही मौज मना रहे हैं। इस प्रकार डॉ. अंबेडकर की लड़ाई नाज़ियों (जो लोग अपने को सभी प्रजातियों से श्रेष्ठ मानते हैं) के "नाज़ी ऑर्डर"  और "ओल्ड ऑर्डर" (मनु संहिताएं) दौनों के विरुद्ध लड़ाई आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है जितनी बाबासाहब के रेडियो प्रसारण के समय 1943 में थी।

आज हम उनके संघर्ष को सैल्यूट करते हैं और उनके प्रेरणादायक विचारों से ऊर्जा लेकर उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का संकल्प लेते हैं। जब तक उनके लोगों में उनका विचार जिंदा है तब तक बाबा साहब जिंदा हैं। शरीर की एक निश्चित आयु होती  है इस लिए डॉ.  अम्बेडकर के प्रेरणादायी विचार अमर हैं जो बोधिसत्व और सास्वत हैं। उनकी विचार ऊर्जा से हम उनका आंदोलन चलाते रहेंगे।

धन्यवाद,

“RSVS” &AMODE”