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कांशीराम - अंबेडकरवादी मास्टर

कांशीराम अंबेडकरवादी मास्टर- ‘समानता की संस्कृति’ उनका लक्ष्य

-के सी पिप्पल

 

आज सत्ता के गलियारों में जब साम्प्रदायिकता सिर चढ़ कर बोल रही है और फिरकापरत ताकतों के हाथों में इंसानियत दम तोड़ रही है, तब अम्बेडकरवाद की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। आखिर यह अम्बेडकरवाद है क्या? मान्यवर कांशीराम जी के संघर्ष से उत्साहित होकर लोग नारा लगाते थे "बाबा तेरा मिशन अधूरा काशीराम करेंगे पूरा" इस लिए यहां कांशीराम जी का नाम लिए बिना उसमें पहिये नहीं नहीं लगते। 

अम्बेडकरवाद एक स्पष्ट समतावादी विचारधारा है जो बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर के दर्शन और उनके आंदोलन के इर्द-गिर्द घूमती है। उदारवादी और अहिंसात्मक तरीके से यह विचारधारा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रांति के द्वारा व्यवस्था परिवर्तन करना चाहती है। इंसानियत का सर्वमान्य फॉर्मूला "वन मैन वन वैल्यू है" जिसके द्वारा सामाजिक, आर्थिक और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की जा सकती है। समानता की इस संस्कृति की स्थापना सबसे पहले महामानव बुद्ध ने की थी। महात्मा फुले और बाबा साहब का संपूर्ण जीवन संघर्ष इसी संस्कृति को समर्पित था। मनु का संविधान असमानता की संस्कृति का प्रतीक रहा है जिसके खिलाफ भारतीय संविधान एक क्रांति है। 

बाबा साहब ने भी बुद्ध की तरह बचपन से ही दुःखों का अनुभव किया, उसमें शील, प्रज्ञा, करुणा और मैत्री को जोड़ कर सम्यक सोच को अपने जीवन का मार्ग बनाया। असमानता की व्यवस्था की मार से निकला मार्ग जो समनता की संस्कृति स्थापित करना चाहता है उसी का नाम अम्बेडकरवाद है। इसको लोग विज्ञानवाद, तर्कवाद, बुद्धिवाद, मानवतावाद, समाजवाद, संविधानवाद और बहुजनवाद के नाम से भी जानते हैं। यह समग्र परिवर्तन की दिशा तय करता है। जिसमें बुद्ध से लेकर कबीर, रविदास, ज्योतिबा फुले, साहू जी महाराज, नारायणा गुरु और पेरियार जैसे अनेक संत महापुरुषों के विचार, ज्ञान व आन्दोलन समाहित है। यह विचार समता, स्वतन्त्रता, बन्धुत्व और न्याय के रास्ते से होकर गुजरता है, जहा पर इंसानियत फलती फूलती है। यह समानता की संस्कृति के अन्तर्गत एक अति-विशिष्ट विचारधारा है जिसका असर हमें बाबा साहब द्वारा निर्मित भारतीय संविधान में देखने को मिलता है। जो मानव कल्याण का एक मात्र रास्ता है।

मान्यवर कांशीराम साहब ने डा.अम्बेडकर को समझने का विशेष प्रयास किया। उन्होंने संविधान में निहित अधिकारों का उपयोग बहुजन समाज के हित में करनेे के लिए बाबा साहब द्वारा दिए हुए राजनीतिक औजार का इइस्तेमाल किया। इस हथियार केे संबंध में बाबासाहेब ने कहा था "Political power is the master key by which you can open each and every lock". इस हथियार को मान्यवर कांशी राम जी ने अपने जीवन में फलित करके दिखाया।

बाबा साहब अंबेडकर के बारे में सबसे पहले उन्होंने अपने साथी प्रमोद कुमार से देहरादून में 6 दिसम्बर 1956 को सुना था। बाबासाहेब अंबेडकर के निधन से आहत होकर प्रमोद ने अपना खाना पीना छोड़ दिया था, वे बार बार यही कह रहे थे कि –आज मेरा बाबा चला गया। उस समय तक कांशीराम जी को अम्बेडकर के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था। कांशीराम जी बार-बार कहते थे कि "तमन्ना सच्ची है तो रास्ते मिल ही जाते हैं"। कांशीराम जी ने प्रमोद से आग्रह किया कि रोने धोने से कुछ नहीं होगा बाबा की जिम्मेदारी उठाने के लिए काम करना होगा और यह जिम्मेदारी आप उठा लीजिए। इस पर प्रमोद कुमार का कहना था कि "अंबेडकर मिशन" चलाना आसान काम नहीं है, बाल-बच्चों वाला व्यक्ति तो बिल्कुल नहीं चला सकता। प्रमोद कुमार ने अपने आप को इस काम के लिए अयोग्य मानते हुए कहा कि वह आधा दजर्न बच्चों के पिता हैं। इस बीच कांशीराम जी का चयन साइंटिफिक आफिसर के पद पर पूना के किर्की फेक्ट्री में हो गया। वहां कार्य करते हुए वे बुद्ध व अम्बेडकर जयंती की छुट्टी को लेकर विवाद में फंस गए। दीनाभाना जी उनके साथ लेब असिस्टेंट थे.. जिन्हें वर्ककमेटी का सदस्य चयनित किया गया था। इस बीच यह मामला कोर्ट में चला गया। इसी बीच उनके साथी डी. के. खापर्डे ने “जातिभेद का उच्छेद” नामक एक किताब कांशीराम जी को दिया जिसे उन्होंने रात भर पढ़ा। और बाद में कई बार पढ़ा। तब उन्हें एहसास हुआ कि बाबा साहब ने बहुत बड़ा महान काम किया है जिसकी व्याख्या साधारण शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। बाबासाहेब आंबेडकर के संघर्ष को समझकर मान्यवर कांशीराम जी ने अम्बेडकरवाद को देश भर में फैलाने का बीड़ा उठाया, जिसके फलस्वरूप आज हम बाबा साहब आंबेडकर और उनके विचारधारा को जान पाए। अत: यहाँ पर उनका जिक्र करना उचित है।

कांशीराम जी का संघर्ष: साहब या मान्यवर के नाम से मशहूर कांशी राम जी का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब में रोपड़ जिले के खवासपुर गांव में उनकी ननिहाल में हुआ था। वे जन्म से सिक्ख थे लेकिन उनकी अंतिम विदाई बुद्धिस्ट के रूप में हुई थी। अपनी एकमात्र पुस्तक "चमचा युग" के अंतिम अध्याय में वे लिखते हैं कि राजनीतिक परिवर्तन स्थाई परिवर्तन है लेकिन सांस्कृतिक परिवर्तन टिकाऊ परिवर्तन का औजार है।

उन्होंने 2002 में बौद्ध धर्म ग्रहण करने का निर्णय लिया था कि 14 अक्टूबर 2006 को दीक्षा दिवस पर 5 करोड़ लोगों के साथ बौद्ध दीक्षा ग्रहण करेंगे। इस दिन बाबा साहब को दीक्षा लिए हुए 50 वर्ष पूरे हो रहे थे। उनका यह संकल्प पूरा नहीं हो सका क्योंकि उनका 9 अक्टूबर 2006 को महापरिनिर्वाण हो गया।

सन 1985 से 2000 तक लगभग 15 वर्षो का अन्तराल अम्बेडकरवाद के प्रचार प्रसार हेतु एक अधिकार युद्ध की तरह सामने आया। यह बहुत महत्वपूर्ण समय रहा, जब इस विचारधारा ने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में अपनी न केवल पैठ बनाने का काम किया, बल्कि आस पास खासकर मध्यभारत में भी अपनी जमीन तैयार करने में सफलता प्राप्त की। उस समय सांप्रदायिक ताकतें सिमट सी गयी थीं। निराश आम जनता को गुलामी व दासता से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने बहुसंख्यक दलित, आदिवासी, पिछड़ी और धार्मिक अल्पसंख्यक जातियों को जो रुढ़िवादी परम्परा में जकड़ी हुई थीं उन्हें अम्बेडकरवाद द्वारा मुक्तिपथ तलाशने का रास्ता दिखाया। और उनके लिए एक सामूहिक पहचान "बहुजन समाज" के नाम से संबोधित किया जो उनकी राजनीतिक ताकत बन गई। उनके नेतृत्व में बहुजन समाज के सामूहिक संघर्ष के कारण आजादी के 40 वर्ष बाद 1990 में संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू हुई।  पिछड़े वर्गों को नौकरियों में और शिक्षा में प्रतिनिधित्व का अधिकार मिला। यह अंबेडकरवाद के संघर्ष का पिछड़ों के लिए एक बड़ा फल था जिससे उनके जीवन में एक सकारात्मक परिवर्तन शुरू हुआ और उनकी आस्था अंबेडकरवाद में बढ़ने लगी।

बहुजन मीडिया : बहुजनों के संघर्ष का इतिहास, 1848 से जोतिबा फुले के संघर्ष से शुरू होता है। समानतावादी मिडिया के सामने कांशीराम जी ने बहुत जनों को जोडऩे के लिए एक समानांतर बहुजन मीडिया स्थापित करने का प्रयास भी किया। वे मुख्यधारा के मीडिया को मनुवादी कहते थे। इसलिए उन्होंने अपनी स्वयं की पत्रिकाओं और अखबारों का प्रकाशन शुरू किया। उनकी पहली पत्रिका थी ‘द अनटचेबल इण्डिया’ (अछूत भारत)। इस पाक्षिक का प्रकाशन 1 जून, 1972 से शुरू हुआ। सन् 1979 से उन्होंने ‘द आपरेस्ड इण्डियन’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इस पत्रिका में संपादकीय लेख कांशीराम स्वयं लिखा करते थे। ‘बहुजन टाइम्स’ नामक दैनिक अखबार का प्रकाशन 31 मार्च, 1984 से मराठी, 14 अगस्त, 1984 से अंग्रेजी और 6 दिसम्बर, 1984 से हिन्दी में शुरू हुआ। ये समाचारपत्र नई दिल्ली और महाराष्ट्र से एक साथ प्रकाशित होते थे। मान्यवर ने कई अन्य मासिक पत्रों का भी प्रकाशन शुरू किया जिनके शीर्षक थे ‘बहुजन साहित्य’, ‘श्रमिक साहित्य’, ‘इकोनोमिक अपसर्ज’, ‘आर्थिक उत्थान’ व ‘बीआरसी बुलेटिन’। ये पत्रिकाएं और अखबार धीरे-धीरे पैसे की कमी और पाठक वर्ग के अभाव के कारण बंद हो गए। कांशीराम ने ‘बहुजन संगठक’ व ‘बहुजन नायक’ नाम से क्रमश: हिन्दी और मराठी में नई दिल्ली व महाराष्ट्र से दो साप्ताहिकों का प्रकाशन शुरू किया। बहुजन संगठक तो कांशीराम की मृत्यु के बाद भी कई सालों तक निकलता रहा। इन बहुजन पत्र-पत्रिकाओंं ने बहुजनों को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

समानता की संस्कृति का औजार- अंबेडकरवाद : बुद्ध द्वारा स्थापित समानता की संस्कृति ही अंबेडकरवाद है जो भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। मान्यवर कांशीराम जी ने इसका जिक्र अपनी पुस्तक The Chamcha Age में विस्तार से किया है। उन्होंने इस पुस्तक में बताया है कि जाति ही असमानता की संस्कृति की जड़ है। जिस को निर्मूल करने के लिए उन्होंने कई समाधान प्रस्तुत किए हैं।

विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग द्वारा स्थापित जाति की संस्कृति "समानता की संस्कृति" के विपरीत है। क्योंकि यह "पूर्णत: असमानता पर आधारित जाति की संस्कृति" है जो वर्ण व्यवस्था की उपज है, जैसा कि कांशी राम जी ने अपनी पुस्तक 'चमचा युग' में बताया है। चमचा युग में समानता की संस्कृति को स्थापित करने के जो टिकाऊ समाधान या उपाय बताये हैं, उनकी विस्तार से चर्चा अधोलिखित भाग में की गयी है।

पुस्तक के भाग चार के विश्लेषण के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला है कि (i) चमचा युग की चुनौती को पूरा करने के लिए, हमें सामाजिक कार्रवाई (सोशल एक्शन) की जरूरत है और (ii) चमचा युग को समाप्त करने के लिए, हमें राजनीतिक कार्रवाई (Political Action) की आवश्यकता है। लेकिन उज्जवल युग (Bright Age) में प्रवेश करने के लिए, हमारे सामने सबसे मुश्किल काम है, जो  इस पीढ़ी और फिर आने वाली पीढ़ियों को पूरा करना होगा। इसके लिए एक पूर्ण सांस्कृतिक परिवर्तन (Complete Cultural Change) करने और उसको टिकाए रखने के लिए सभी तरह के नियंत्रण की आवश्यकता है। केवल इस तरह के सांस्कृतिक परिवर्तन से ही समस्या का टिकाऊ समाधान निकल सकता है।

वास्तविक और बुनियादी समस्या: भारत में, हमारी वास्तविक और बुनियादी समस्या सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक है। बाकी सब कुछ इस बुनियादी समस्या का परिणाम है। चमचा युग इस प्रमुख बुनियादी समस्या का एक मामूली परिणाम है।

भारत में शास्त्रों का धर्म है जिसकी अजीब धार्मिक धारणाएं हैं। यह धारणाएँ न केवल हावी हैं, बल्कि यह असमानता की संस्कृति का निर्माण करती हैं। इन धार्मिक धारणाओं के वर्चस्व के कारण एक अजीबोगरीब संस्कृति का निर्माण हुआ है, जिसे जातियों की संस्कृति के रूप में जाना जा सकता है, अन्य देशों के लोग कहते हैं कि धर्म व्यक्तिगत चीज है, लेकिन संस्कृति सामान्य धारणाएं है। इस प्रकार यह दौनों अलग- अलग की जा सकती हैं। लेकिन भारत में यह दोनों एक ही चीज हैं।

जाति - समस्या की जड़: डॉ.अम्बेडकर ने जाति पर 2 प्रमुख निबंध लिखे थे, जिनका नाम है: 

(1) "कास्ट्स इन इंडिया, देयर ओरिजिन एंड मैकेनिज्म" (भारत में जातियाँ, उनकी उत्पत्ति और उनका तंत्र)

(2) "एननिहिलेशन ऑफ़ कास्ट" (जाति का उन्मूलन) 

जाति के खिलाफ उनके धर्मयुद्ध और उस पर उनके अन्य लेखन को छोड़दें, तब भी जाति के विरुद्ध इन दो निबंधों के आधार पर, उन्हें जाति उन्मूलन का सबसे बड़ा आधिकारिक प्रवक्ता माना जा सकता है, जैसा कि उनके विचार के अनुसार जाति व्यवस्था एक सामाजिक प्रणाली है, जो हिंदुओं के विकृत तबके की दुष्टता और उनके निजी स्वार्थों का प्रतीक है, जो समुदाय सामाजिक स्थिति में बेहतर था, उसने अपनी श्रेष्ठता हमेशा के लिए स्थापित करने के लिए उच्च अधिकार अर्जित करके अपने से हीन लोगों को बराबरी के अधिकारों से वंचित करके नीचे ढकेल दिया। इस अपमानजनक सामाजिक व्यवस्था को कड़ाई से लागू करने के लिए एक कठोर दंड प्रक्रिया संहिता की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति 'मनु स्मृति' ने की।

जाति व्यवस्था एक ऐसी बीमारी थी जिसने हिंदुओं को ग्रसित करके भारत के दूसरे लोगों को भी संक्रमित कर क दिया, जिसने अन्य भारतीयों के सामाजिक भाईचारे और खुशियों को बुरी तरह प्रभावित किया। यह व्यवस्था सभी भारतीयों के लिए एक बड़ी समस्या बन गई। इस बुरी व्यवस्था के खिलाफ बहुत कुछ कहा जा चुका है, बहुत कुछ कहा जा सकता है। लेकिन यहाँ, हमने इसका यह निष्कर्ष निकाला है कि जाति अतीत में भारतीयों की समस्या थी, यह अभी भी हमारी समस्यायों का एक बड़ा हिस्सा है।

अतीत में खुले तौर पर जाति भेद का इस्तेमाल किया जाता था और जाति सम्बन्धी प्रतिबंधों का बहुत सख्ती से पालन किया जाता था। एक लंबे समय तक जाति उच्च स्थिति प्राप्त तबके के लिए लाभदायी बनी हुई थी।

19वीं शताब्दी के मध्य से, इस बुरी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की चिन्गारी शुरू हुई थी। जो 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इतनी अधिक फैल गयी, कि 1950 तक, यह दोनों तरफ से काटने वाली दोधारी तलवार बनने लगी। उच्च जाति के हिंदुओं ने इस खतरे को भांप लिया, इतना ही नहीं उन्होंने जाति के कॉलम को जनगणना की अनुसूची से हटा दिया। इसलिए, आज जाति के संबंध में किसी भी प्रामाणिक और अभिलेखबद्ध जानकारी के लिए, हमें 1931 की जनगणना को देखना पड़ता है।

हर रोज आज भी जाति का असर खूब दिखाई देता  है। लेकिन यह प्रच्छन्न रूप में है। सत्तारूढ़ जातियां, आबादी में कम होने के नाते, इसके बारे में ज्यादा नहीं बोलती हैं, लेकिन इनके लोग गुप्त रूप से इसका इस्तेमाल अपने जाति के पक्ष में करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। इतना ही नहीं, सत्तारूढ़ जातियों के द्वारा इस पर खुलकर नहीं बोलना परन्तु गुप्त रूप से इसका इस्तेमाल करना एक फैशन बन गया है, खासकर सत्ता के लीवर (चाबी) को अपने हाथ में रखने के लिए। नेहरू काल के राजनीतिक प्रदर्शन को देखें, तो उनके शासन के दौरान 1957 के संसदीय लोकसभा चुनाव में 47% ब्राह्मण चुनाव जीत गए। एस.सी./एस.टी. के 22.5% सांसद उनके आरक्षित कोटे के बराबर आरक्षित सीटों से चुने गए, इनके कारण नेहरू जी भारत और भारतीयों पर बड़े आराम से राज करते रहे। लेकिन 1980 तक राजनीति के उक्त जातिगत समीकरण बदल गये, खासकर तब जब एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार बाबू जगजीवन राम भी भारत के प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक हो गए थे। इसलिए 1980 में इंद्राजी को संसद में बहुमत हासिल करने के लिए 36% ब्राह्मणों और 15% क्षत्रियों के सांसदों को चुन कर लाने की आवश्यकता पड़ी।

पिछले अध्याय में, ब्राह्मणों द्वारा राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता को हथियाने के कृत्य के 2 चार्ट जोड़े गए हैं। यहां, हम केवल इस तथ्य की ओर इशारा करने में रुचि रखते हैं कि जाति समीकरणों के परिवर्तन से कैसे सत्ता हासिल और बरकरार रखी जा सकती है। निश्चित रूप से आप जातिगत समीकरण पर विचार किये बिना सत्ता हासिल नहीं कर सकते। उस समय नेहरू से लेकर इंद्रा तक जातिगत समीकरणों के विशेषज्ञ जाति के खिलाफ बोलते रहते थे और दूसरों को जातिवादी करार देते रहते थे।

जाति व्यवस्था कैसे खड़ी है: इस अध्याय में यह बताने के लिए एक रेखाचित्र जोड़ा गया है कि जाति व्यवस्था या सामाजिक व्यवस्था कैसे खड़ी है। इस संरचना में, जाति इमारत की ईंटें हैं। उक्त रेखा चित्र स्वव्याख्यात्मक है।

व्यवस्था के लाभार्थियों ने सभी 5 प्रमुख शक्तियों और स्रोतों पर एक तरह से एकाधिकार कर लिया है, जिससे एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का निर्माण हो गया है। इन शक्तियों /अधिकारों के नाम हैं:

(1) राजनीतिक, (2) नौकरशाही

(3) सामंती, (4) आर्थिक और

(5) सांस्कृतिक। 

स्केच में, कुछ जातियों को मध्यस्थ जातियों के रूप में दिखाया गया है जो O.B.C का हिस्सा नहीं हैं। हांलाकि, धार्मिक दृष्टि से उन्हें शूद्रों की श्रेणी में रखा जाता है इसके बावजूद भी वे लाभान्वित और उन्नत हुई हैं। जबकि दूसरी ओर व्यवस्था के पीड़ित लोग हर मोर्चे पर परास्त होकर घाटे में रहे हैं।

अतीत के विद्रोह: पिछले दिनों में, पूरे भारत के विभिन्न भागों में कई विद्रोही महापुरुषों ने जातियों की इस संस्कृति के खिलाफ विद्रोह किया। उक्त विद्रोह में महात्मा ज्योतिबा फुले, पेरियार ई. वी. रामास्वामी, नारायण गुरु और बाबा साहेब अम्बेडकर के योगदान का विशेष महत्व है। साहित्य का ढेर उनके विद्रोह और उन्हें मिली सफलता के बारे में बताने में सक्षम है। यहां हम जातियों की इस संस्कृति को बदलने के लिए उनके द्वारा अपनाए गए साधनों पर विशेष ध्यान देना चाहते हैं। महात्मा फुले द्वारा सत्यशोधक समाज, पेरियार ईवीआर द्वारा बुद्धिवाद और नास्तिकता और बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म के आंदोलनों ने परिवर्तन को प्रभावित किया, आंदोलन को प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने कुछ विशेष साधनों का उपयोग किया था। इन साधनों के भविष्य को देखते हुए, हम निराशा महसूस करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जातियों की इस खोई हुई संस्कृति को पुनः स्थापित करने के लिए असमानतावादी ताकतों का मजबूत समर्थन है। लेकिन फिर भी हमारे प्रयासों के परिणामस्वरूप, उनके मन में जातिवादी कुकृत्यों के प्रति अपराधबोध पैदा हुआ है। यह परिवर्तन हमारी गतिविधियों को और विस्तार देने के लिए बहुत उपयोगी साबित होगा।

भविष्य के लिए कार्य: अतीत के अनुभव के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हमें एक उज्वल  युग  के निर्माण के लिए जबरदस्त तरीके से कार्य करना होगा। खासकर, जब हम यह जानते हैं कि जातियों की इस संस्कृति को छिपे और खुले तौर पर सिस्टम के लाभार्थियों का समर्थन मिल रहा है। लेकिन "पूर्णत:असमानता की इस संस्कृति" को "पूर्णत:समानता की संस्कृति" में बदलने के लिए हमारा प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए। असमानता पर आधारित वर्तमान संस्कृति की स्थापना इसके लाभार्थियों ने की है और इसको बरकरार रखने का प्रयास भी इन्हीं के द्वारा किया जाता है। लेकिन इस व्यवस्था को बदलने और भविष्य में "पूर्णत: समानता की संस्कृति" का निर्माण करने और उसको बनाए रखने का काम इस व्यवस्था के सभी पीड़ितों को मिलकर अपने हाथों में लेना चाहिए। इसके लिए हमें आपसी वैमनस्य और झगड़ों से बचना जरूरी है। इसके लिए हमें मौर्य साम्राज्य के पतन से सबक लेने की जरूरत है।